रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। जिसमें रोटी अर्थात् भोजन इनमें सर्वोपरि है। इसी भोजन के लिए न जाने मनुष्य क्या करता है एवं कभी - कभी वह इतना लाचार हो जाता है कि कूड़े - कचरे में अपनी बेबसी का हल खोजने लगता है । परंतु जब सभी प्रयासों के पश्चात् भी एक वक्त का भोजन नसीब न हो, तब वह स्वयं को अंधकार से घिरा हुआ पाता है। भूख क्या है यह केवल वही जान सकता है जिसने उसको सहा हो एवं भोजन के मूल्य को मात्र वही समझ सकता है जिसके खाने के लिए एक अन्न का दाना न हो । भूखमरी किसी भी देश के लिए एक बड़ी समस्या है। भारत वैसे तो आँकड़ों के अनुसार विकासशील देशों की श्रेणी में आता है किंतु यहाँ हर रोज़ न जाने कितने ही लोगों के जीवन का अंत भोजन के अभाव में होता है। इसका एक उदाहरण हाल ही में पूर्व दिल्ली के मंडावली इलाके में भूख के कारण हुई ३ मासूम बच्चियों मृत्यु से मिलता है। पारूल, मानसी, शिखा तीन बहनें जिन्होंने 8 दिनों तक भूख की मार को सहा। लेकिन अन्त में उनकी सहनशक्ति ने भी उनका साथ छोड़ दिया। दो अस्पतालों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यह साफ तौर पर बताया गया है कि बच्चियों के पेट अन्न का एक दाना नहीं था। अति तो तब होती है जब इस पर भी सरकारों ने स्वयं के दामन से दाग हटाने के लिए गमगीन पारिवारिक जनों पर दबाव बनाकर मीडिया के सामने यह कहलवाया कि बच्चियों ने सोमवार को भोजन ग्रहण किया था। इन मासूमों के पिता जो रोज़गार की तलाश में घर से निकले थे, अब तक घर नहीं लौटे हैं। माँ की मानसिक स्थिति ऐसी है, उन्हें यह तक ज्ञात नहीं कि उनके परिवार के साथ क्या घटित हुआ है। परंतु इस संवेदनशील घटना को भी सियासतदारों ने मात्र आरोप - प्रत्यारोप एवं कटाक्ष का विषय बना दिया। यह सिर्फ इन इन तीन बच्चियों की ही कहानी नहीं है, भारत में प्रतिदिन २० करोड़ बच्चे भूखे सोते हैं। तथापि हमारे राजनेताओं को यही याद दिलाने से फुर्सत नहीं मिलती कि भारत विश्व की छठीं (6) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
दिल्ली, देश की राजधानी है, जो कुछ समय से केवल उपहास का विषय बनकर रह गई है, क्योंकि कुछ वर्षों से यहाँ धरनों के अतिरिक्त कुछ नहीं हो रहा है। मंडावली जैसी गंभीर घटना को भी सरकारों ने 9×9 के उस कमरे में जाकर (जहाँ उन तीन मासूमों न दम तोड़ा) अपनी झूठी सहानुभूति व्यक्त करने का ज़रिया बना लिया। इन्हीं सियासतदारों ने उस कमरे से बाहर निकलकर विपक्ष पर आरोप मढ़े, किसी ने स्वयं की उपलब्धियाँ गिनायीं, किसी ने आई.सी.डी.एस (ICDS) पर दोष डाल दिया। ये वही लोग हैं, जो स्वयं अपने वातानुकूलित मंत्रालयों एवं कार्यालयों में बैठते हैं तथा जिनके केवल सालाना नाश्ते का बिल ही लाखों में आता है। ऐसे ए.सी. चेम्बरों में बैठने वाले लोग जो 5 मिनट भी उस 9×9 के कमरे में नहीं बिताते, जिन्हें भूखमरी क्या होती है? इसका लेश्मात्र ज्ञान नहीं, वे कहते हैं " हम उनके दुख को समझ सकते हैं एवं इसमें उनके साथ हैं।"
15 अगस्त 2018 को भारत का 72वां स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। 72 वर्ष राजनेताओं को शायद इन दुखों को समझने में ही लग गए और आजतक इन्हें समझ नहीं पाए। यदि समझ गए होते तो "ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2017" (वैश्विक क्षुधा सूची) में भारत का स्थान 119 देशों की सूची में, 97वें से घटकर 100वाँ न हो जाता। यह स्थान नॉर्थ कोरिया, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका आदि देशों से भी नीचे है।
सत्ता एवं मानवता को शर्मसार मात्र राजनेता ही नहीं वरन् पत्रकार एवं स्वयं हम भी करते हैं। पत्रकारिता को संविधान का चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह सत्य को पटल पर रखने का माध्यम माना जाता है । किंतु आधुनिक पत्रकारिता केवल धन अर्जित करने का ज़रिया बनकर रह गयी है। जिन समाचारों से धन कमाया जा सके, उन्हें मुख्य समाचार बनाकर पेश कर दिया जाता है । मंडावली में हुई भूखमरी एवं उसके पीछे के कारणों से अवगत कराना और यह बताना कि उस इलाके में रहने वाले लोगों के पास आधार कार्ड होने के बावजूद उनका राशन कार्ड नहीं बना है। जिसके कारण वे भोजन के अभाव को झेलते हैं, बच्चों को सरकारी विद्यालयों में मिड डे मील मिलता भी है या नहीं? यह दुखद एवं चिंताजनक समाचार शायद मुख्य खबर बनने के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता। इसलिए इसे सामान्य खबरों की तरह 15 मिनट में 200 खबरों में से एक खबर बनाकर पेश कर दिया जाता है। प्रधानमंत्री का विदेश दौरा मुख्य समाचार है क्योंकि भारत में भूखमरी की ये कोई पहली घटना तो है नहीं। ये तो सालों से हो रहा है। इसीलिए न तो यह मुख्य खबर और न ही वाद - विवाद का विषय बनने योग्य है। सत्ता एवं पत्रकारिता के बीच हम जैसे लोग, जो प्रतिदिन इन पर तंज कसते हैं। उस दिनचर्या में हम यह भूल जाते हैं कि भूखमरी के पीछे हमारा भी उतना ही हाथ है जितना सत्ताधीशों एवं पत्रकारों का। हम उनके दोष तो गिनाते हैं पर स्वयं कितने दोषी हैं यह भूल जाते हैं। हम प्रतिदिन न जाने कितना अन्न व्यर्थ करते है, जो कूड़ेदान में जाता है।इसी व्यर्थ किये गये भोजन को अनेक लोग उस कूड़ेदान में पाकर फूले नहीं समाते। यह उस देश में होता है, जहाँ 169323000000(एक लाख उन्हत्तर हज़ार तेईस करोड़) की सब्सिडी भोजन के अधिकार के कानून के तहत सरकार द्वारा दी गई है। जिस देश में प्रतिवर्ष 67 लाख टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है । इतनी खाद्य सामग्री किसी कम जनसंख्या वाले देश में प्रतिवर्ष ग्रहण की जाती होगी। यदि हमने अभी इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो इसके भयावह परिणाम हमें देखने होंगे। सरकारों को यह समझना होगा कि विकास L.G. के घर पर धरना देने, बुलेट ट्रेन लाने या 15 मिनट संसद में भाषण देकर भूकंप लाने से नहीं बल्कि मानव की मूलभूत आवश्यकताओं को केंद्र में रखकर उन पर काम करने से आएगा। संसद में खड़े होकर स्वयं को जनता का भागीदार बताना सरल है पर वास्तव में भागीदार बनना कठिन है।
बूंद - बूंद करके घड़ा भरता है। अगर हम सब मिलकर प्रयास नहीं करेंगे तो आने वाले 72 वर्षों में भी इन समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएंगें।
by - Aarti Rajput
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