जीवन इसका मतलब सीधा है, सीधा बोला भी जा सकता है -कोई जीवन को उपहार समझता है तो दूसरी ही सोच में जीवन भार के समान लगने लगता है, पर इससे ये पता नहीं चलता कि जीवन है क्या?
जीवन उपहार है?
जीवन बोझ है? /या
जीवन खुशी है?
आखिर जीवन है क्या? आज मैं आपको बताँऊगी कि जीवन है क्या? ‘जीवन कालचक्र है’ जो हमेशा चलता रहता है, कालचक्र का अर्थ- ‘जीवनकाल से है’ अर्थात् ‘जीवन का कालचक्र’। जिसमें एक इंसान हर प्रकार के अनुभव को महसूस करता है, जिसमें सुख-दुख, अमीरी-गरीबी, जात-पात, ऊच-नीच और ऐसे ही कई फसांनो से हमें गुजरना पङता है। जिसमें जीवन का कालचक्र तब से शुरू हो जाता है जब से हमारा जन्म होता है, जब एक बच्चे का जन्म होता है तो जन्म के साथ ही उसके हर एक से रिश्ते बन जाते हैं।सबसे पहले तो माँ का रिश्ता जो उसे जन्म देती है, फिर पिता का रिश्ता जो उसे जीवन का आधार बताता है, चलिए रिशतो की बातो को एक तरफा न रखकर हम जीवन के दोनों पहलुओं की बात करते हैं जिसमें जीवन को एक चक्र यानी पहिये के समान माना जाता है, जिस प्रकार पहिया चलता रहता है उसी तरह जीवन भी चलता रहता है, सभी का जीवन समान नहीं होता। जीवन सबके लिए कुछ कर दिखाने या कुछ पाने का होता है, पर एक इंसान अपने जीवन से कुछ-न-कुछ पाने की सोचता रहता है, एक इंसान की सोच होती है कि उसने अपने जीवन से क्या कुछ पाया क्या कुछ ग्वाया ? पर मेरी समझ में ये नहीं आया कि इसांन हमेशा अपने जीवन से कुछ-न-कुछ पाने की सोचता है पर उसने ‘जीवन में अपने अलावा किसी के लिए कुछ किया या अपने परिवार के लिए ही कुछ किया’?
मेरी बात या मेरा प्रश्न अपने आप में ठीक है मेरी बात आपको गलत लगी हो या आपका विचार ये हो कि एक व्यक्ति अपने जीवन में जो करता है वो अपने परिवार के लिए ही करता है ।तो अपनी बात को समझाते हुए एक उदा० देना चाहुँगी ‘परिवार के लिए या परिवार की खुशी के लिए एक ही जिम्मेदारी होती है या ली जाती है उस परिवार के मुखिया द्वारा’।जी हाँ, “एक औरत ही परिवार की ताकत व हौसला होती है जो सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि अपने परिवार के हर सदस्य के जीवन को बनाती है, मेरी बात तो बिल्कुल सही है न गलत ।
चाहे कुछ भी हो मेरी सोच में एक महिला का जीवन में, जीवन बनाने में सबसे बङा योगदान है।आप मेरी सोच पर सवाल नहीं उठा सकते , क्योंकि आप भी जानते हैं आपके जीवन में भी एक औरत का ही योगदान है जो एक छोटी बच्ची से लेकर बुज़ुर्ग महिला भी हो सकती है, जो दादी-नानी, माँ-बहन-बेटी इन अलग-अलग रुपो में हमारे जीवन का महत्वपूर्ण भाग है इनके बिना जीवन का कोई महत्व नहीं ।
जीवन चक्र तो कच्चे धागे के समान है जिसे हम जितना चाहे उतना मजबूत कर सकते हैं या जितनी चाहे इतनी ढील छोङ सकते हैं। लेकिन जीवन को कैसे जीना है ये उसी व्यक्ति की जीवनी निश्चित करती है साफ अक्षरो में यही कहना चाहुँगी जिस तरह तोते को जैसी सगंत में रखा जाता है वो वैसा ही बनता है, वैसे ही एक इंसान अपने जीवन चक्र में क्या करता है क्या नहीं करता है इससे कोई फर्क नहीं पङता-पर सवाल तो ये है कि वह उस काम को कैसे करता है सही या गलत तरीके से-कहने को तो जीवन-मृत्यु की सारी बातें चलती ही रहेगीं क्योंकि जीवन को आधार की आवश्यकता है शब्दों की नहीं ।
मैनें अपने शब्दों में जीवन की एक ही परिभाषा जानी है।
“जीवन एक कहानी की तरह है जिसे सभी को लिखना पङता है पर इसके कलाकार अपने आप ही मौजूद होते हैं ”-इसके लिए मेहनत की भी जरुरत नहीं होती और हम समझते हैं जीवन कितना कठिन है ये हमारी सोच पर टिका है कि हमारी आँखे जीवन को किस मात्रा में देखती हैं ।
एक रंगमंच की तरह
या
बोझ की ।
Riya Tomar
Gyanarthi media college
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