Sunday, 28 April 2019

The way to develop a scientific temperament in old and young alike.

The only way to foster a scientific temperament is to evolve communication in our lives. Whether Interpersonal or intra personal. Second most important thing is acceptance and a zeal for learning. Children as we all know they are curious by nature. This curiosity demands a lot more from elders. Due to this inquisitiveness they ask people questions and somehow when people are unable to answer their questions either they scold them or answer them wrong. So this kind of behavior is need to be tackled by acceptance and for acquire learning. When elders will learn they will provide their children with right information. They should tell that we worship Basil plant because it has healing power, Banyan tree is prayed because it produces abundance of oxygen, we sit on floor in squatting position since center of gravity works their to concentrate. Such examples lead towards the roots of observation and a hunger for immense knowledge. As well as institutions i.e. schools should organize fun science workshops for children and parents. Science can never be memorized it is to practice and create something new. In this context 80% of science lessons should be experiential rather than storing the data in our mind. This will inculcate interest in both old and young alike. 

By - Aarti Rajput     .
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Wednesday, 17 April 2019

क्या भारत वास्तव में विकास की ओर अग्रसर है??

रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। जिसमें रोटी अर्थात् भोजन इनमें सर्वोपरि है। इसी भोजन के लिए न जाने मनुष्य क्या करता है एवं कभी - कभी वह इतना लाचार हो जाता है कि कूड़े - कचरे में अपनी बेबसी का हल खोजने लगता है । परंतु जब सभी प्रयासों के पश्चात् भी एक वक्त का भोजन नसीब न हो, तब वह स्वयं को अंधकार से घिरा हुआ पाता है। भूख क्या है यह केवल वही जान सकता है जिसने उसको सहा हो एवं भोजन के मूल्य को मात्र वही समझ सकता है जिसके खाने के लिए एक अन्न का दाना न हो । भूखमरी किसी भी देश के लिए एक बड़ी समस्या है। भारत वैसे तो आँकड़ों के अनुसार विकासशील देशों की श्रेणी में आता है किंतु यहाँ हर रोज़ न जाने कितने ही लोगों के जीवन का अंत भोजन के अभाव में होता है। इसका एक उदाहरण हाल ही में पूर्व दिल्ली के मंडावली इलाके में भूख के कारण हुई ३ मासूम बच्चियों मृत्यु से मिलता है। पारूल, मानसी, शिखा तीन बहनें जिन्होंने 8 दिनों तक भूख की मार को सहा। लेकिन अन्त में उनकी सहनशक्ति ने भी उनका साथ छोड़ दिया। दो अस्पतालों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यह साफ तौर पर बताया गया है कि बच्चियों के पेट अन्न का एक दाना नहीं था। अति तो तब होती है जब इस पर भी सरकारों ने स्वयं के दामन से दाग हटाने के लिए गमगीन पारिवारिक जनों पर दबाव बनाकर मीडिया के सामने यह कहलवाया कि बच्चियों ने सोमवार को भोजन ग्रहण किया था।  इन मासूमों के पिता जो रोज़गार की तलाश में घर से निकले थे, अब तक घर नहीं लौटे हैं। माँ की मानसिक स्थिति ऐसी है, उन्हें यह तक ज्ञात नहीं कि उनके परिवार के साथ क्या घटित हुआ है। परंतु इस संवेदनशील घटना को भी सियासतदारों ने मात्र आरोप - प्रत्यारोप एवं कटाक्ष का विषय बना दिया। यह सिर्फ इन इन तीन बच्चियों की ही कहानी नहीं है, भारत में प्रतिदिन २० करोड़ बच्चे भूखे सोते हैं। तथापि हमारे राजनेताओं को यही याद दिलाने से फुर्सत नहीं मिलती कि भारत विश्व की छठीं (6) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। 

दिल्ली, देश की राजधानी है, जो कुछ समय से केवल उपहास का विषय बनकर रह गई है, क्योंकि कुछ वर्षों से यहाँ धरनों के अतिरिक्त कुछ नहीं हो रहा है। मंडावली जैसी गंभीर घटना को भी सरकारों ने 9×9 के उस कमरे में जाकर (जहाँ उन तीन मासूमों न दम तोड़ा) अपनी झूठी सहानुभूति व्यक्त करने का ज़रिया बना लिया। इन्हीं सियासतदारों ने उस कमरे से बाहर निकलकर विपक्ष पर आरोप मढ़े, किसी ने स्वयं की उपलब्धियाँ गिनायीं, किसी ने आई.सी.डी.एस (ICDS) पर दोष डाल दिया। ये वही लोग हैं, जो स्वयं अपने वातानुकूलित मंत्रालयों एवं कार्यालयों में बैठते हैं तथा जिनके केवल सालाना नाश्ते का बिल ही लाखों में आता है। ऐसे ए.सी. चेम्बरों में बैठने वाले लोग जो 5 मिनट भी उस 9×9 के कमरे में नहीं बिताते, जिन्हें भूखमरी क्या होती है? इसका लेश्मात्र ज्ञान नहीं, वे कहते हैं " हम उनके दुख को समझ सकते हैं एवं इसमें उनके साथ हैं।" 

15 अगस्त 2018 को भारत का 72वां स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। 72 वर्ष राजनेताओं को शायद इन दुखों को समझने में ही लग गए और आजतक इन्हें समझ नहीं पाए। यदि समझ गए होते तो "ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2017" (वैश्विक क्षुधा सूची) में भारत का स्थान 119 देशों की सूची में, 97वें से घटकर 100वाँ न हो जाता। यह स्थान नॉर्थ कोरिया, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका आदि देशों से भी नीचे है। 

सत्ता एवं मानवता को शर्मसार मात्र राजनेता ही नहीं वरन् पत्रकार एवं स्वयं हम भी करते हैं। पत्रकारिता को संविधान का चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह सत्य को पटल पर रखने का माध्यम माना जाता है । किंतु आधुनिक पत्रकारिता केवल धन अर्जित करने का ज़रिया बनकर रह गयी है। जिन समाचारों से धन कमाया जा सके, उन्हें मुख्य समाचार बनाकर पेश कर दिया जाता है । मंडावली में हुई भूखमरी एवं उसके पीछे के कारणों से अवगत कराना और यह बताना कि उस इलाके में रहने वाले लोगों के पास आधार कार्ड होने के बावजूद उनका राशन कार्ड नहीं बना है। जिसके कारण वे भोजन के अभाव को झेलते हैं, बच्चों को सरकारी विद्यालयों में मिड डे मील मिलता भी है या नहीं? यह दुखद एवं चिंताजनक समाचार शायद मुख्य खबर बनने के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता। इसलिए इसे सामान्य खबरों की तरह 15 मिनट में 200 खबरों में से एक खबर बनाकर पेश कर दिया जाता है। प्रधानमंत्री का विदेश दौरा मुख्य समाचार है क्योंकि भारत में भूखमरी की ये कोई पहली घटना तो है नहीं। ये तो सालों से हो रहा है। इसीलिए न तो यह मुख्य खबर और न ही वाद - विवाद का विषय बनने योग्य है। सत्ता एवं पत्रकारिता के बीच हम जैसे लोग, जो प्रतिदिन इन पर तंज कसते हैं। उस दिनचर्या में हम यह भूल जाते हैं कि भूखमरी के पीछे हमारा भी उतना ही हाथ है जितना सत्ताधीशों एवं पत्रकारों का। हम उनके दोष तो गिनाते हैं पर स्वयं कितने दोषी हैं यह भूल जाते हैं। हम प्रतिदिन न जाने कितना अन्न व्यर्थ करते है, जो कूड़ेदान में जाता है।इसी व्यर्थ किये गये भोजन को अनेक लोग उस कूड़ेदान में पाकर फूले नहीं समाते। यह उस देश में होता है, जहाँ 169323000000(एक लाख उन्हत्तर हज़ार तेईस करोड़) की सब्सिडी भोजन के अधिकार के कानून के तहत सरकार द्वारा दी गई है। जिस देश में प्रतिवर्ष 67 लाख टन खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है । इतनी खाद्य सामग्री किसी कम जनसंख्या वाले देश में प्रतिवर्ष ग्रहण की जाती होगी। यदि हमने अभी इस विषय पर गंभीरता से विचार नहीं किया तो इसके भयावह परिणाम हमें देखने होंगे। सरकारों को यह समझना होगा कि विकास L.G. के घर पर धरना देने, बुलेट ट्रेन लाने या 15 मिनट संसद में भाषण देकर भूकंप लाने से नहीं बल्कि मानव की मूलभूत आवश्यकताओं को केंद्र में रखकर उन पर काम करने से आएगा। संसद में खड़े होकर स्वयं को जनता का भागीदार बताना सरल है पर वास्तव में भागीदार बनना कठिन है। 

बूंद - बूंद करके घड़ा भरता है। अगर हम सब मिलकर प्रयास नहीं करेंगे तो आने वाले 72 वर्षों में भी इन समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएंगें।

by - Aarti Rajput

Friday, 5 April 2019

जीवन चक्र

जीवन इसका मतलब सीधा है, सीधा बोला भी जा सकता है -कोई जीवन को उपहार समझता है तो दूसरी ही सोच में जीवन भार के समान लगने लगता है, पर इससे ये पता नहीं चलता कि जीवन है क्या? 

 जीवन उपहार है?

 जीवन बोझ है? /या 

 जीवन खुशी है? 

आखिर जीवन है क्या? आज मैं आपको बताँऊगी कि जीवन है क्या? ‘जीवन कालचक्र है’ जो हमेशा चलता रहता है, कालचक्र का अर्थ- ‘जीवनकाल से है’ अर्थात् ‘जीवन का कालचक्र’। जिसमें एक इंसान हर प्रकार के अनुभव को महसूस करता है, जिसमें सुख-दुख, अमीरी-गरीबी, जात-पात, ऊच-नीच और ऐसे ही कई फसांनो से हमें गुजरना पङता है। जिसमें जीवन का कालचक्र तब से शुरू हो जाता है जब से हमारा जन्म होता है, जब एक बच्चे का जन्म होता है तो जन्म के साथ ही उसके हर एक से रिश्ते बन जाते हैं।सबसे पहले तो माँ का रिश्ता जो उसे जन्म देती है, फिर पिता का रिश्ता जो उसे जीवन का आधार बताता है, चलिए रिशतो की बातो को एक तरफा न रखकर हम जीवन के दोनों पहलुओं की बात करते हैं जिसमें जीवन को एक चक्र यानी पहिये के समान माना जाता है, जिस प्रकार पहिया चलता रहता है उसी तरह जीवन भी चलता रहता है, सभी का जीवन समान नहीं होता। जीवन सबके लिए कुछ कर दिखाने या कुछ पाने का होता है, पर एक इंसान अपने जीवन से कुछ-न-कुछ पाने की सोचता रहता है, एक इंसान की सोच होती है कि उसने अपने जीवन से क्या कुछ पाया क्या कुछ ग्वाया ? पर मेरी समझ में ये नहीं आया कि इसांन हमेशा अपने जीवन से कुछ-न-कुछ पाने की सोचता है पर उसने ‘जीवन में अपने अलावा किसी के लिए कुछ किया या अपने परिवार के लिए ही कुछ किया’? 

      मेरी बात या मेरा प्रश्न अपने आप में ठीक है मेरी बात आपको गलत लगी हो या आपका विचार ये हो कि एक व्यक्ति अपने जीवन में जो करता है वो अपने परिवार के लिए ही करता है ।तो अपनी बात को समझाते हुए एक उदा० देना चाहुँगी ‘परिवार के लिए या परिवार की खुशी के लिए एक ही जिम्मेदारी होती है या ली जाती है उस परिवार के मुखिया द्वारा’।जी हाँ, “एक औरत ही परिवार की ताकत व हौसला होती है जो सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि अपने परिवार के हर सदस्य के जीवन को बनाती है, मेरी बात तो बिल्कुल सही है न गलत ।

  चाहे कुछ भी हो मेरी सोच में एक महिला का जीवन में, जीवन बनाने में सबसे बङा योगदान है।आप मेरी सोच पर सवाल नहीं उठा सकते , क्योंकि आप भी जानते हैं आपके जीवन में भी एक औरत का ही योगदान है जो एक छोटी बच्ची से लेकर बुज़ुर्ग महिला भी हो सकती है,  जो दादी-नानी, माँ-बहन-बेटी इन अलग-अलग रुपो में हमारे जीवन का महत्वपूर्ण भाग है इनके बिना जीवन का कोई महत्व नहीं ।

     जीवन चक्र तो कच्चे धागे के समान है जिसे हम जितना चाहे उतना मजबूत कर सकते हैं या जितनी चाहे इतनी ढील छोङ सकते हैं। लेकिन जीवन को कैसे जीना है ये उसी व्यक्ति की जीवनी निश्चित करती है साफ अक्षरो में यही कहना चाहुँगी जिस तरह तोते को जैसी सगंत में रखा जाता है वो वैसा ही बनता है, वैसे ही एक इंसान अपने जीवन चक्र में क्या करता है क्या नहीं करता है इससे कोई फर्क नहीं पङता-पर सवाल तो ये है कि वह उस काम को कैसे करता है सही या गलत तरीके से-कहने को तो जीवन-मृत्यु की सारी बातें चलती ही रहेगीं क्योंकि जीवन को आधार की आवश्यकता है शब्दों की नहीं ।

     मैनें अपने शब्दों में जीवन की एक ही  परिभाषा जानी है।

   “जीवन एक कहानी की तरह है जिसे सभी को लिखना पङता है पर इसके कलाकार अपने आप ही मौजूद होते हैं ”-इसके लिए मेहनत की भी जरुरत नहीं होती और हम समझते हैं जीवन कितना कठिन है ये हमारी सोच पर टिका है कि हमारी आँखे जीवन को किस मात्रा में देखती हैं ।

   एक रंगमंच की तरह

           या 

        बोझ की ।

    

Riya Tomar

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