आज हम बात करेगें नैतिकता, प्रेम, उपासना, सम्मान और विचारधारा की जो आज हमें कितनी आगे लेकर आ गयी है, विचारो की बात कही जाए तो ऐसी कई सारी बातें हैं जो हमारे मन में आती हैं ये कोई नहीं जानता पर इसमें कोई शक नहीं हम आज कितनी आगे बढ़ चुके हैं। हम सभी में से किसी को भी ये याद नहीं रहता कि हम सभी कितना कुछ अपने जीवन के पीछे छोङकर आगे जा चुके हैं। लेThe किन कोई बात नहीं समय-समय पर एेसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती रहती हैं जो हमें हमारे जीवन के ऐसे दृश्यो को दिखाती है जो अच्छे और बुरे अनुभवों से होकर गुजरे हैं। अब मैं हम सभी की एक और आदत जिसे हम अपना स्वभाव भी कह सकते हैं, जिसे समझाने के लिए हम अनेक प्रकार के तौर-तरीक़े अपनाते हैं वो जिसे हम अपनी आदत बना लेतें हैं वो है -‘अपनी बातों को बङा-चङाकर बोलने की आदत' हमारी ये आदत हमारे आस-पास और खुद हमें मुख्य रुप से प्रभावित करती है।
हमारा स्वभाव ही हमारी कई कमियों और कई खूबियों को हमारे सामने ले आता है जिसे हम अपनी खुली आँखो से नहीं देख पातें उन्हीं आँखो से हमारे कई सारे काम ऐसे होते हैं जिन्हें हम नहीं देखना चाहते लेकिन फिर भी वह सभी दृश्ये हमारे सामने आ जाते हैं, स्वभाव को केवल एक जरिया माना जाता है अपने आप को जानने का समझने का।
अब बात की जाए नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी की जो एक दूसरे को समझने में बहुत समय लेती हैं क्योकिं न नई पीढ़ी के विचार पुरानी पीढ़ी से मिलते हैं और न ही पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी की नई सोच को समझना चाहती है इन सबके बीच अब बात की जाए तालमेल की तो विचारो और सोच में तालमेल बैठाना बहुत मुश्किल हो जाता है, जब हम सभी विचारो और हमारी सोच को एक गाङी पर सवार होकर चलने की कोशिश करते हैं तो बस किसी-न-किसी तरीके से गाङी की टक्कर हो जाती है।अब हमारा ही काम होता है कि विचारूपी, सोचरूपी गाङी के सारे पहिये साथ में काम करें। क्योकिं वह हम ही होतें हैं जो अपनी सोच और समझ से काम लेतें हैं पर इसमें भी हम कभी-कभी खुद को बङों से ज्यादा बुद्धिशाली व्यक्ति
के रूप में नजर आतें हैं, जहां परिवार में बङे छोटो को समझाते हैं तो वहीं छोटो को लगता है कि बङे उन्हें आगे बङने देना ही नहीं चाहते लेकिन गहराई से सोचने पर पता लगता है कि हम कितनी बङी गलती कर रहे थे क्योकिं बङो की सोच अधिक अनुभवी होती है पर इसमें ये कहा नहीं जा सकता कि हमारे बङे जो कहते हैं वो हमेशा सही होता है क्योकिं कभी-कभी बङो की सोच भी पुरातनपंथी हो जाती है। जहां हमेशा सही बात न होने की बात आती है, वहीं कहीं-न-कहीं कई सारी ऐसी बातें जो हमारी सोच के परे होती हैं वो हमें हमारे बुजुर्गो से सीखने मिलती हैं इसलिए कभी-भी स्वयं को बङो या किसी से भी अधिक ज्ञानी सोच वाला नहीं कहा जा सकता।
एक कहानी में जहां माँ अपने बेटे से कहती रहती है अच्छे आचरण में रहोगे तो एक कामयाब इसांन के रूप में दुनिया को दिखोगे वहीं बेटा सोचने लगता है सिर्फ एक बार कोई मुझे यह बताए कि हमेशा माँ या कोई भी बङा मुझे समझाता रहता है, सिखाता रहता है।आगे चलकर किसी-न-किसी रूप में हमें माँ की दी हुई सीख याद आती है और हम इसी बजह से खुद को एक कामयाब इसांन की गिनती में गिन पातें हैं।
जिस तरह हम अपने शहीदों और जवानों की तारीफ करते हैं, वहीं उनकी वीर कथाओं को एक-दूसरे से कहतें हैं क्योकिं हम सभी जानतें हैं कि जो व्यक्त अच्छा काम करता है वही आगे बङ सकता है क्योकिं जरूरी नहीं है अमीर और ज्ञानी व्यक्ति ही उच्च स्थान की शोभा होता है बल्कि एक साधारण इसांन अपनी ताकत दिखाए तो बङे-से-बङे नामी व्यक्त की कुर्सी हिला सकता है इससे ये पता चलता है कि पहले सब एक साधारण व्यक्तित्व के रूप में हैं बाद में नामी व्यक्त के रूप में उनकी पहचान है। पहचान बनाने की बात कही जाए तो पहचान व्यक्ति के अच्छे-बुरे कामो से बनती है, इसमें केवल एक ही भिन्नता होती है अच्छी पहचान बनाने वाले व्यक्ति को सभी जानतें हैं और बुरी पहचान वाले व्यक्ति कोसब जानना चाहते हैं क्योकिं अच्छी पहचान वाला व्यक्ति सबकी नजर में रहकर काम करता है और एक अच्छी पहचान बनाता है और वहीं बुरी पहचान वाला व्यक्ति नजरे चुराकर सारे काम करता है और लोग यही जानना चाहते हैं कि इस व्यक्ति ने ऐसा क्या काम किया जिसकी बजह से इसकी बुरी पहचान इसके बुरे कामो की बजह से है तो इसनें जो बुरे काम किए हैं उन बुरे कामो को न दोहराए
क्योकिं इन्हीं बुरी आदतों के कारण समाज में हमारी बुरी पहचान बनेगी।
सभी प्रकार से बुरी और अच्छी आदतें हम सभी के अंदर होती हैं लेकिन ये हम पर निर्भर करता है कि हम समाज में अपनी अच्छी आदतों के कारण जाने जाए या बुरी आदतों की बजह से।
यह सम्पूर्ण लेख हमारे समाज, जल-जीवन व हमारे शहीदों और जवानों को समर्पित था।
! ! जय हिन्द जय भारत!!
by- Riya Tomar